आई लव मुहम्मद — एक आध्यात्मिक विश्लेषण

I love muhammad
यदि किसी व्यक्ति के बतलाए मार्ग पर चल कर आपको कुछ औसम् अदभुत सा मिल जाए जिससे आपका जीवन विधायक रूप से रूपांतरित हो जाए तो क्या आप नही कहेंगे कि आई love…….
ओशो की मार्फत जिन्होंने पाया उन्होंने आई love ओशो कहा
मीरा ने कहा मैंने राम रतन धन पायो और आई love कृष्ण कहा और प्रेम के गीत गाये
मुहम्मद साहब को मानने वालो की मासुमियत यह है कि इन्होंने पाया नही और कहा।
मुहम्मद साहब की अडियोलॉजी की हम बात करे, तो मुहम्मद साहब की पूरी ऐडियोलॉजी एक ही लाइन मे समाहित है “आओ उस बात की ओर जो मुझमे तुममे और सब मे एक है” यानि जानो उस सनातन तत्व को जो सभी जीवो मे समान रूप से व्याप्त है जिसका क्लू उन्होंने दिया की वह सर्वाधार और निरपेक्ष है।
जाकिर नाइक की सारी तकरीर का आधार यही वाक्य है बस फर्क बस इतना है की वह धर्म ग्रंथो के अक्षर शब्द और वाक्यों को समान (एक) सिद्ध करने मे लगा है।
मुहम्मद साहब की यात्रा इस्लाम से इल्हाम (आत्मज्ञान) तक की यात्रा है, जो उस तत्व यानी सनातन तत्व को जानने का एक ही विकल्प है
आत्मज्ञान के बिना परमात्म ज्ञान संभव नही है।
आत्मज्ञान ही समस्त समस्याओं का समाधान है और धर्म आत्मज्ञान का एक मात्र विज्ञान।
इसीलिए सभी आत्मज्ञानियों ने धर्म की अनुशंसा समान रूप से की है किसी ने धर्म किसी ने धम्म किसी ने दीन और किसी ने रिलीजन कहा।
हमें मुहम्मद साहब को धर्म तल पर समझना होगा,
मै अपनी इस यात्रा के लिये मुहम्मद साहब का हृदय से आभारी हूँ इसीलिए कहता हूँ आई love मुहम्मद

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    और उनकी शिक्षाओं पर आधारित पुस्तक कुरान को धार्मिक शिक्षा-प्रणाली के रूप में अपनाते हैं।

    मेरा मानना है कि धर्म परोपकार का बीज है,
    जो किसी व्यक्ति में फलित होने पर परोपकार के फल देता है।

    इसी कसौटी पर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है —
    क्या मुहम्मद वास्तव में एक रसूल हैं?

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